इस 'बुलंद' दरवाजे के नीचे दबा है खजाना, भीड़ के सामने लटकाकर दी जाती थी फांसी


ग्वालियर.उपनगर ग्वालियर में लधेड़ी गेट को शहर का बुलंद दरवाजा कहा जाता है। राज्य पुरातत्व संरक्षित इस स्मारक का निर्माण ग्वालियर रियासत के तत्कालीन राजा कल्याण मल ने कराया था। बागियों की फांसी से लेकर गढ़े हुए खजाने की अफवाहों के गवाह इस लधेड़ी गेट दोस्ती की एक मिसाल है। कैसा है ये गेट...
-ग्वालियर स्थित लधेड़ी गेट अपनी खूबसूरत कला एवं मीनार के लिए जाना जाता है।
-यहां पहुंचने के लिए किलागेट व सागरताल से जाया जा सकता है।
-इस गेट का निर्माण 14वीं और 15वीं सदी के दौरान किया गया था। उस दौरान ग्वालियर के राजा थे कल्याण मल।
दोस्ती की मिसाल
-यह गेट ग्वालियर और जौनपुर के शासकों की दोस्ती की मिसाल भी माना जाता है।
-लधेड़ी गेट को यमनपुर भी कहा जाता है।
-जौनपुर की तर्ज पर इसका नाम यमनपुर रखा गया था।
इस गेट का निर्माण कराया
-जौनपुर में लोधी वंश का शासन था। इसी वंश के एक शासक आजम लाद खान थे, जो जौनपुर की सरकी रियासत का काम संभालते थे।
-ग्वालियर से कल्याण मल जौनपुर गए थे। वहां उनकी लाद खान से मुलाकात हुई।
-इस दौरान उनकी दोस्ती हो गई। बाद में जब कल्याण मल ग्वालियर लौटकर आए, तो उन्होंने इस गेट का निर्माण कराया था।
फांसी देने के लिए इस जगह का उपयोग
-हालांकि इतिहास की किताबों में इस बात का जिक्र नहीं मिलता है, लेकिन ऐसी कई कहानियां हैं कि बाद में यहां राजाओं ने अपने दुश्मनों को फांसी पर भी लटकाया था।
-वह खुले में फांसी देने के लिए इस जगह का उपयोग करते थे।
राजाओं ने अपने खजाने भी गाढ़े
-यह गेट राज्य संरक्षित स्मारक में आता है।
-कहा जाता है कि यहां कुछ राजाओं ने अपने खजाने भी गाढ़े थे।
-इसे ढूंढने के लिए कई बार असामाजिक तत्व यहां खुदाई कर चुके हैं।
-सरकार ने ऐसे लोगों के खिलाफ कई बार कार्रवाई भी की है।


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