मुंबई/नई दिल्ली.स्पेनिश टैल्गो ट्रेन का फाइनल ट्रॉयल शनिवार देर रात पूरा हुआ। दिल्ली-मुंबई राजधानी रूट पर इस ट्रेन ने अपने आखिरी ट्रॉयल में 150kmph रफ्तार पकड़ी। 1,384 km का सफर 11 घंटे 49 मिनट में पूरा किया। यह ट्रेन दिल्ली से शनिवार दोपहर 2.45 बजे निकली थी। इसे मुंबई में रात 2.29 बजे पहुंचना था। लेकिन यह रात 2.34 बजे पहुंची। इस बार टैल्गो को 12 घंटे से कम में पहुंचने का टारगेट रखा गया था।वहीं, राजधानी एक्सप्रेस को यह दूरी तय करने में 16 घंटे लगते हैं। तीसरे ट्रायल में 18 मिनट लेट थी टैल्गो...
- दिल्ली-मुंबई के बीच की दूरी 1,384 km है। तीसरे ट्रायल में ट्रेन को रात 2.57 बजे पहुंचना था, लेकिन वह 3.15 बजे पहुंची थी। इस दौरान ट्रेन की मैक्सिमम स्पीड 150kmph रही।
- टैल्गो का पहला ट्रायल उत्तर प्रदेश के बरेली-मुरादाबाद खंड के बीच कराया गया था।
- दूसरा ट्रायल नॉर्थ-सेंट्रल रेलवे के पलवल-मथुरा खंड के बीच हुआ था।
- पिछले 3 ट्रायल में टैल्गो इस स्पीड तक नहीं पहुंच पाई थी।
130-40 kmph पर हुए थे पिछले टेस्ट
- टैल्गो के पिछले ट्रायल 130-40 किमी प्रति घंटा की स्पीड से किए गए। जबकि अभी तक देश में राजधानी एक्सप्रेस एवरेज स्पीड 90-100 kmph और शताब्दी ट्रेन की 80-90 kmph होती है।
- बता दें कि टैल्गो की एवरेज स्पीड 90-100 kmph और मैक्सिमम स्पीड 130-150 kmph होती है।
- टैल्गो में हल्के कोच लगे हुए हैं, जिनका मकसद दिल्ली से मुंबई की जर्नी के वक्त को 4 घंटे तक कम करना है। अभी राजधानी एक्सप्रेस को इस दूरी को तय करने में 16 घंटे लगते हैं।
टैल्गो के स्पेनिश कोचों में मिलेगी ये फैसिलिटी
- भारतीय कोचों में पहियों के बीच कमानी और सामान्य शॉकर होते हैं, जबकि टैल्गो कोच में शॉकर में हाइड्रॉलिक पावर होने के कारण तेज स्पीड में भी न तो झटके लगते हैं, न वाइब्रेशन होता है।
- डिस्क ब्रेक होने से तुरंत रोकने पर भी ट्रेन बिना झटके के रुक जाती है।
- वैक्यूम टॉयलेट हैं, चेयर कार में 36 और एग्जीक्यूटिव में 27 सीटें हैं।
- दोनों सीटों के बीच लेग स्पेस भारतीय ट्रेनों की तुलना में तीन इंच ज्यादा है।
- 4 सीटों के बीच में एक एलईडी टीवी लगी है। सुनने के लिए हर सीट पर ईयरफोन प्लग है।
तीखे मोड़ पर भी पूरी रफ्तार से दौड़ेगी टैल्गो
- हाईस्पीड टैल्गो ट्रेन को किसी कर्व पर दूसरी ट्रेनों की तरह रफ्तार कम करने की जरूरत नहीं होगी।
- ऐसा इसलिए पॉसिबल होगा, क्योंकि इसके कोच में सिर्फ 2 ही व्हील हैं, जबकि भारतीय ट्रेनों में एक कोच में 8 व्हील होते हैं।
- व्हील के बीच कोई एक्सल नहीं है। टैल्गो के हर व्हील में इंडिविजुअल पावरिंग सिस्टम है, ऐसे में प्रत्येक व्हील को रोकने और घुमाने में आसानी होती है।

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