चित्तौड़गढ़. राजस्थान के भीलवाड़ा और राजसमंद के बाद एक और अंधविश्वास से जुड़ी कहानी की सच्चाई परखने के लिए हमारी टीम पहुंची चित्तौड़गढ़ जिले के कपासन में हजरत दीवाने शाह की दरगाह। इबादत की जगह जहां हर धर्म के लोग आते हैं, यहां हमें मिले बेड़ियों में जकड़े, मजबूत तालों से पेड़ों और खंभों से बंधे लोग जिनका यहां ‘इलाज' चल रहा है। दावा किया जाता है कि यहां बने हॉस्पिटल में मानसिक रोगियों का इलाज किया जाता है। मगर सच्चाई ये है कि अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़े लोग यहां रूहानी ताकतों का साया दूर करने के नाम पर मरीजों को बेड़ियों में जकड़कर रखते हैं।बच्चे को भी बांध कर रखते हैं यहां...
- यहां रूहानी साये के इलाज के लिए हर उम्र के लोग आते हैं। इनमें 8-10 साल के मासूम बच्चों से लेकर 80 साल तक के बुजुर्ग शामिल हैं।
- लोहे की जंजीरों में जकड़े ज्यादातर लोग गरीब, दलित और महिलाएं हैं। इनमें से अधिकांश लोग मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं बावजूद इसके उन्हें इन बेड़ियों से निजात नहीं मिल रही।
- उदयपुर के देलवाड़ा की 15 साल की देऊ पूरी तरह स्वस्थ है लेकिन उसके पिता मांगीलाल उसे आजाद करने को तैयार नहीं है।
- शाहपुरा के 20 साल के युवक राहुल को भी दिन में 20-22 घंटे पेड़ से बंधे रहना पड़ता है। दरगाह प्रशासन का तर्क है कि किसी दूसरे को नुकसान ना पहुंचा पाए इसलिए पेड़ से बांधकर रखते हैं।
रोगी से उगलवाते हैं कि शरीर में रूहानी ताकत का है वास
- मानसिक रोगी से बाबा की मजार पर आते ही यह उगलवाया जाता है कि उसके शरीर में किसी रूहानी ताकत ने जगह बना रखी है।
- साथ ही इनसे यह भी कहलाया जाता है कि वह रूहानी ताकत इनके शरीर में कितने दिन रहेगी। इसी से उनके वहां रहने के दिन तय होते हैं।
- इनका मानना है कि रूहानी ताकत पराए शरीर में 40 दिन तक रहती है इसलिए रहने का समय 11, 21 और 40 दिन निर्धारित है।
- सबसे पहले भर्ती मरीज और उसके परिजन चिल्ले के खंभे पर डोरा बांधते हैं। मजार के सामने रोगी पर राख चढ़ाते हैं और उसे गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां खिलाते हैं, दोपहर को बाबा की खिदमत में फिर पेश करते हैं।
- शाम को लोबान के वक्त रोगी के ऊपर धूणी का धुआं घुमाया जाता है। 40 दिन तक यही क्रम चलता है।
ढांचा हॉस्पिटल जैसा मगर काम रूढ़िवादी
- दरगाह के भीतर आधारभूत ढांचा तो किसी हॉस्पिटल जैसा बना है लेकिन यहां के तौर-तरीके पूरी तरह अंधविश्वास पर टिके हैं।
- हॉस्पिटल की तरह वार्ड और कॉटेज रूम बने हैं लेकिन इनमें इलाज के नाम पर टोने-टोटके का सहारा लिया जाता है।
न दवा न इलाज फिर भी ठीक करने का दावा
- दरगाह में 11, 21 और 40 दिन तक रहने वाले मरीजों को न तो कोई दवा दी जाती है और न ही किसी तरह का इलाज किया जाता है। सुबह-शाम मजार के चारों तरफ बेड़ियों से जकड़े लोगों को कई चक्कर लगवाए जाते हैं।
- कोई चक्कर लगाने से मना करता है तो साथ चल रहे परिजन डंडों से पिटाई करते हैं। हर तरफ रोने, चीखने-चिल्लाने और सिसकियों की आवाजें सुनाई देती हैं।

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