रांची.रांची में रहनेवाला एक ऑटो ड्राइवर अपनी जिंदगी से लोगों को नई राह दिखा रहे हैं। मुश्किलों से जो लोग हिम्मत हार जाते हैं, उन्हें लाइफ में कुछ करने के लिए हौसला दे रहे हैं। जी हां, बंटी गुप्ता जब अपनी ऑटो लेकर सड़क पर निकलते हैं तो हर किसी के जुबान से उनके के लिए वाह शब्द ही निकलता है। रूटीन काम भी नहीं कर पाता था बंटी...
- बता दें कि 8 साल पहले रांची के बंटी गुप्ता के दोनों पैर ट्रेन के नीचे आने से कट गए गए थे।
- वो ऑटो चलाकर अपने परिवार का खर्च चलाता था। हादसे के बाद उसे लगा कि अब जिंदगी खत्म हो गई।
- एक्सिडेंट के बाद लोगों ने उसे लोकल हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया था। बंटी के हालत को देखते हुए रांची के रिम्स में रेफर कर दिया गया।
- करीब ढाई साल तक इलाज चलता रहा। करीब 17 लाख रुपए खर्च हुए। इतने पैसों की व्यवस्था में पूरा परिवार जुट गया।
- पत्नी छोटा-मोटा काम करने लगी। पिता की तो पहले ही मौत हो चुकी थी। उनके बैंक अकाउंट से बचे हुए पैसे भी निकालने पड़े।
- इतना करने के बावजूद भी खर्च पूरा नहीं हो पा रहा था। बंटी के लिए फैमिली को कर्ज लेना पड़ा।
3 साल तक बेड पर पड़ा रहा बंटी
- ढाई साल इलाज के दौरान जिंदगी पटरी से उतर गई थी। लेकिन घर वालों ने हिम्मत नहीं हारी।
- इसके बाद बंटी डॉक्टर के कहने पर तीन साल तक घर पर आराम करता रहा।
- उसे बाथरूम जाने के लिए भी पत्नी से कहना पड़ता था। वो इलाज के लिए दिल्ली और जयपुर भी गया।
- लेकिन, वहां उसके साइज के प्रोस्थेटिक पैर नहीं मिले। फिर रांची में ही डेढ़ लाख में प्रोस्थेटिक पैर बना कर दिए।
- नए पैर लगने के बाद बंटी को बेहद राहत मिली। उसके पूरी फैमिली की जिम्मेदारी आ गई थी। कर्ज के पैसों को भी लौटाना था।
- किसी तरह फिर से ऑटो चलाने की प्रैक्टिस करने लगा। काफी मशक्कत करने के बाद सफलता हासिल हुआ।
- प्रोस्थेटिक पैर से तो वह चल तो नहीं सकता, लेकिन ऑटो चलाने में कामयाब हो गया।
- बता दें कि चलने वाले पैरों के लिए बंटी को 20 लाख रुपए खर्च करने पड़ेंगे।
ऑटो चलाकर रोज 500 से 600 रुपए होती है कमाई
- नए पैर लगाने के बाद उसे इस पर संतुलन बनाने के लिए दो महीने की ट्रेनिंग दी गई।
- इस दौरान पैरों में जख्म हो गए। खून भी निकला। लेकिन अब जख्म सूख चुके हैं और सब ठीक है।
- जब पैर था, तब प्रति दिन की कमाई एक हजार रुपए थी। अभी 500 से 600 रु. कमा पाता है।
- सुबह सात बजे से दोपहर दो बजे तक ऑटो चलाता है। सरकार से मदद की उम्मीद थी, लेकिन मिली हर महीने मात्र 700 रुपए की मदद।

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