लखनऊ.यहां का बड़ा इमामबाड़ा सत्रहवीं शताब्दी की वास्तुकला और नवाबी पीरियड की इमारत है। पर्यटकों के लिए ये इमारत आज भी रहस्य बनी हुई है। महज 10 लाख में बनी ये इमारत आज दुनिया में आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना है। इस इमारत में एक हजार से भी ज्यादा रास्ते हैं। यहीं नवाब आसफुद्दौला का खज़ाना दफन है, जिसका राज आजतक कभी किसी को नहीं मिल सका। जानिए क्या है इमामबाड़े की खासियत...
- गोमती नदी के किनारे बना बड़ा इमामबाड़ा नवाब आसफुद्दौला ने बनवाया है।
- इस इमारत को बनाने में न तो लोहे का इस्तेमाल हुआ है और न ही किसी खंभे का।
- 50 मीटर लंबा, 16 मीटर चौड़ा हॉल सिर्फ ईंटों का जाल बनाकर निर्मित किया गया है।
- इसकी ऊंचाई 15 मीटर है और लगभग 20,000 टन भारी छत बिना किसी बीम के सहारे मजबूती से टिकी हुई है। इसे देखकर बड़े-बड़े इंजीनियर भी भौचक्के रह जाते हैं।
- यह इमारत खाद्य पदार्थों से मिलकर तैयार हुई है। दीवारों के निर्माण के लिए उड़द की दाल, चूने आदि का मिश्रण इस्तेमाल किया गया है।
- महज 10 लाख में बनी इमामबाड़े की ये इमारत आज दुनिया में आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना है।
जिसको न दे मौला, उसको दे आसफुद्दौला
- सन 1784 में एक बार अवध प्रांत में बहुत बड़ा अकाल पड़ा।
- लखनऊ भी इससे अछूता नहीं रहा। उस समय भूखमरी का वो आलम चरम सीमा पर था। लोग भूखे मरने लगे।
- ये अकाल 8 से 10 साल तक रहा। चारों तरफ हाहाकार मच गया और रईस लोग भी इससे अछूते नहीं रहे।
- तब अवध के नवाब आसफुद्दौला ने लोगों को रोज़गार देने के लिए इमामबाड़े को बनवाया था।
- नवाब ने पैसे न बांटकर काम करवाकर पैसे देना सही समझा।
- इमामबाड़े के बनने से करीब 20,000 लोगों को रोज़गार मिला।
- निचले तबके और कारीगर लोग दिन में काम करते थे। साथ ही जो अमीर घराने के लोग थे उनसे रात में काम कराया गया, ताकि उन्हें शर्म न महसूस हो।
- निचले तबके के लोग दिनभर जो निर्माण करते थे। रात को अमीर लोग उसे गिराने का काम करते थे।
- जब अवध के हालात बेहतर होने लगे तब इस ईमारत का मुकम्मल निर्माण कराया गया।
- आसफुद्दौला के बारे में तबसे एक मुहावरा बना दिया गया 'जिसको न दे मौला, उसको दे आसफुद्दौला'।
अद्भुत है भूल-भुलैय्या
- भूल-भुलैय्या में दीवार के एक सिरे पर माचिस की तीली जलाने पर या कागज फाड़ने पर उसकी आवाज 16 मीटर दूर दूसरे सिरे तक सुनाई देती है।
- भूल-भुलैय्या को खासतौर पर इंटर लॉकिंग ब्रिक वर्क से बनाया गया है।
- भूल-भुलैय्या में अकेले जाना मना है क्योंकि यहां एक हजार से ज्यादा छोटे-छोटे भ्रामक रास्ते हैं, जिनमें कुल 479 दरवाज़े हैं।
- इसी मकड़जाल में लोग फंसकर अक्सर गुम हो जाते हैं। यहां पसरा सन्नाटा भी काफी डरावना है। इसलिए यहां वही लोग आते हैं, जिनका दिल मजबूत होता है।
ये है भूल-भुलैय्या से निकलने का तरीका
- अगर भूल-भुलैय्या में ऊपर चढ़ते जाएंगे तो यहां से निकलकर छत पर पहुंच पाएंगे, लेकिन अगर नीचे चलते रहेंगे तो भटक जाएंगे।
- यहां से निकलने की यही तरकीब है कि ऊपर की तरफ चलें।
- भूल-भुलैय्या से निकलने का रास्ता सबसे ऊपर से मिल सकता है।
- भूल-भुलैय्या में जाने के लिए गाइड मौजूद रहते हैं।
शाही बावली में दफन है खजाने की चाभी
- इमामबाड़े की बावली पांच मंजिला है। यह सीढ़ीदार कुआं है।
- शाही हमाम नामक यह बावली गोमती नदी से जुड़ी हुई है। इसमें पानी के ऊपर दो मंजिलें हैं। शेष तल पानी में डूबे रहते हैं।
- इसमें से बहुत सी सुरंगे निकलती हैं, जो लखनऊ से बाहर अन्य राज्यों तक जाती हैं।
- जब अंग्रेज नवाब आसफुद्दौला का खज़ाना लूटने आए तो उनके वफादार मुनीम खजाने की चाबी और नक्शा लेकर इसी बावली में कूद गए थे।
- इसके बाद अंग्रेज़ों ने अपने सिपाहियों को इस बावली में मुनीम या उसके शव को ढुंढने के लिए भेजा, लेकिन कोई भी सिपाही वापस नहीं लौटा।
- खज़ाना इस इमामबाड़े या सुरंगों के जाल के बीच कहीं भी हो सकता है। उसका नक्शा और चाबी आज भी इसी बावली में दफन है।

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